Thursday, August 20, 2009

संशय

वेध्यार्थी एक तपस्वी है
कभी कभी मार्ग से भटक
सही ग़लत मे उलझ कर रह जाता है
पूछता है बताता है
हर रोज अपनी ही एक कहानी बनाकर
उस पर सवाल उठाता है
खुश होता है तडपता है
हँसते हुए रोता है
कुछ क्षद व्यव्हार पागल जेसा होता है
वेदाम्बना यह है की पागलपन का उस पागल को भी पता होता है
हर तथ्य मे संशय होता है
हर उतर मे एक प्रशन होता है
रात चिंता और दिन प्रयास होते है
हर प्रयास मे चिंता के भाव होते है
और चिंता से प्रयास उदास होते है
वेद्यार्थी उन क्षदो मे समझता नही
की कोण सा रास्ता मंजिल की और है
किस रास्ते की किस्मत रात
और किस मंजिल के रास्तो पर भोर है
पर सच्चा वेद्यार्थी इस च्करावयूओ को तोड़ता है
और भ्रम के सागर से पार सरस्वती से मार्गो को जोड़ता है !!

3 comments:

M VERMA said...

अच्छी रचना पर वर्तनी सुधार आवश्यक है

RAJ SINH said...

वर्मा जी की टिप्पणी पर विचार करें .गूगल transliteration का प्रयोग करते हों तो उसमे जाकर वर्तनी सुधार की विधियाँ पायेंगे .शुरू में सभी को ये दिक्कतें आती हैं .
आपकी सोच और कविता में संभावनाएं हैं ,और तराशें .
हिन्दी ब्लॉगजगत में आपका स्वागत करता हूँ .सार्थक लेखन और सामूहिक मंच पर आपसी सोच और विमर्श का आदान प्रदान की स्वस्थ्य परंपरा ही हम सबका उद्देस हो तथा मत विभिन्नता में भी शालीनता हम बनाये रख सकें यही प्रयास भी .शुभकामनाओं सहित -राज सिंह

पुनश्च : यदि आपने वर्ड वेरिफिकेसन लगाया हो तो उसकी उपयोगिता कुछ खास नहीं है ,हटा दें .हाँ यदि सोचते हों की टिप्पणियों में अभद्रता पाई जा सकती है तो मोदेरेसन का इस्तेमाल कर सकते हैं .

Divya said...

पर सच्चा वेद्यार्थी इस च्करावयूओ को तोड़ता है
और भ्रम के सागर से पार सरस्वती से मार्गो को जोड़ता है !!

I can quite see a true vedaarthi in you.

beautiful creation.